The movement of the Defense Committee was sponsored for supremacy in power
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सत्ता में वर्चस्व के लिए प्रायोजित था रक्षा समिति का आन्दोलन

पड़तालः ऊधम सिंह नगर रक्षा समिति आन्दोलन 1997-2000

 

By Rupesh kumar Singh

“गैरसैंण राजधानी का विरोध करने वालों, तुम वही हो जो उस समय जनपद ऊधम सिंह नगर को उत्तराखण्ड से अलग करने की मांग कर रहे थे। आज विधायक, मंत्री-संत्री, नेता बने धूम रहे हो! तब तुम्हारी मांग मान ली जाती, तो तुम उत्तर-प्रदेश में रहकर जिन्दगी में कभी गांव के प्रधान तक न बन पाते।’’ तराई के एक विधायक से बहस के बाद मैंने 26 अप्रैल, 2018 को उपरोक्त पोस्ट फेसबुक पर शेयर की थी। जल्द एक लेख लिखूंगा, यह रज़मंदी भी फेसबुक पर तमाम मि़त्रों के कमेंट के बाद मैंने दी थी।
राज्य गठन से पूर्व ऊधम सिंह नगर रक्षा समिति ने जनपद ऊधम सिंह नगर को उत्तराखण्ड से पृथक करने के बावत जबर्दस्त आन्दोलन छेड़ा था। यह बात दीगर है कि उस समय आन्दोलन के अगुवा आज अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध कर चुके हैं। कोई ब्लाक प्रमुख है, तो कोई जिला पंचायत सदस्य। कोई विधायक है, तो कोई मंत्री। तत्कालीन समय जिन नीतियों और उन्हें लागू करने वाली भाजपा सरकार की जमकर मुखालफत करने वाले नेता आज भाजपा की गोद में बैठकर सत्ता की चासनी का रसपान कर रहे हैं। मौकापरस्त वे नेता आज ऊधम सिंह नगर रक्षा समिति के इतिहास पर बात करने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
सीधा सवाल है उन नेताओं से-” या तो ऊधम सिंह नगर को उत्तराखण्ड से अलग करने का विरोध गलत था, या फिर आज भाजपा में शामिल होकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सिद्ध करना गलत है’’, ’’या तो आप तब एक आन्दोलनकारी के तौर पर सही थे, या आज एक मौकापरस्त दलबदलू नेता के तौर पर सही हैं।’’ दोनों में से एक ही स्थिति सही हो सकती है। राज्य गठन के 18 साल बाद प्रदेश की जनता आपसे सवाल कर रही है। किसी एक कृत्य के लिए आपको माफी मांगनी ही चाहिए। यह बात भी दिलचस्प है कि ऊधम सिंह नगर को उत्तराखण्ड से अलग रखने की मांग रूद्रपुर से शुरू हुई, आग पंजाब में सुलगी और असर तत्कालीन केन्द्र में अटल सरकार पर पड़ा। वास्तव में रक्षा समिति का आन्दोलन स्वतःस्फूर्त नहीं बल्कि प्रायोजित था। ऐसा तमाम घटनाओं से प्रतीत होता है। इस आन्दोलन के तमाम पहलू हैं, जिनको समय के साथ-साथ सत्ता की राजनीतिक धूल से पाट दिया गया है। उन्हें उजागर होना ही चाहिए।
9 नवम्बर, 2000 को पृथक उत्तराखण्ड राज्य बना। लेकिन इससे पूर्व संसद में कई दिनों तक बहस के नाम पर जमकर नौटंकी हुई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बोल ने नव गठित राज्य का घोर अपमान भी किया। राज्य की सीमागत स्थिति पर बोलते हुए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा, “उत्तराखण्ड में विधायक की हेसियत ब्लाक प्रमुख जितनी भी नहीं होगी। राज्य के पास संसाधन नहीं हैं। या तो ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार को उत्तराखण्ड से अलग कर दो या फिर इनसे लगे दो-दो जिले और शामिल कर दो।’’ उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा, ’’ तराई के जनपदों को उत्तराखण्ड में शामिल करना इसलिए जरूरी है कि पहाड़ को रोटी मिलती रहे।’’ आशय साफ है कि कोई भी दल उत्तराखण्ड को पर्वतीय प्रदेश के रूप में डेवलप करने को राजी नहीं था। असल में पहाड़ और मैदान के बीच अन्तर्विरोध को भाजपा व सपा ने साजिश के तहत जबर्दस्त हवा दी। कांग्रेस सहित बाकी राजनीतिक दल भी इस अन्तर्विरोध को समय-समय पर तीखा करते रहे हैं।
उत्तराखण्ड पहाड़ियों का राज्य होगा। यहां पहाड़ियों का वर्चस्व होगा। अन्य समुदाय व तराई के साथ भेदभाव होगा। सीलिंग एक्ट सख्ती से लागू होगा। ऐसी तमाम आशंकाओं को हवा देकर सपा, किसान यूनियन के नेताओं व बड़े फार्म मालिकों ने मिलकर 1997 के अन्त में गोल मार्केट रूद्रपुर में बैठक की। बैठक में ऊधम सिंह नगर को उत्तराखण्ड से अलग करने के लिए आन्दोलन करने को रक्षा समिति का गठन किया गया। खटीमा के बड़े फार्मर व कांग्रेस नेता अनन्त राम तलबार को अध्यक्ष व सपा नेता राजेश शुक्ला को महामंत्री चुना गया। इसके अलावा केन्द्रीय स्तर पर 21 नेताओं की कमेटी बनायी गयी। जिसमें किसान यूनियन के चैधरी राय सिंह, अकाली दल नेता हरभजन सिंह चीमा, कांग्रेस नेता हरगोविन्द सिंघल, सीपीएम नेता कामरेड महिपाल सिंह, बसपा नेता भाग सिंह आदि शामिल थे।
संगठित तौर पर जरूर 1997 के अन्त में जनपद को अलग रखने की मांग उठी हो, लेकिन विरोध की सुगबुगाहट 1994 में मुजफ्फरनगर काण्ड के बाद शुरू हो गयी थी। इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। घटना के बाद से उत्तराखण्ड की जनता और मुलायम सिंह आमने-सामने थे। इधर राज्य के लिए आन्दोलन भी चरम पर था। जानकार बताते हैं कि मैदान में अपने वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए मुलायम सिंह यादव ने पहाड़ और मैदान के बीच की खाई को चैड़ा किया। मुलायम सरकार में तक बाजपुर निवासी सरदार भुपेन्द्र सिंह राणा एम एल सी हुआ करते थे। मुलायम ने भुपेन्द्र को लखनऊ बुलाया और कहा, ” पूरा उत्तराखण्ड अलग राज्य के लिए जल रहा है, तुम लोग क्या कर रहे हो? क्या तुम लोग उत्तराखण्ड में सुरक्षित रहोगे?’’ ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार में सपा कमजोर थी। इस मुद्दे को उठाकर सपा अपनी जड़ मजबूत करना चाहती थी। सपा ने अलग राज्य का कभी समर्थन नहीं किया। इस कारण भी सपा ने केन्द्र सरकार को अलगाव में डालने के लिए इस मामले को हवा दी।
1995 के प्रारम्भ में भुपेन्द्र सिंह राणा व पूर्व ब्लाक प्रमुख ठाकुर मानवेन्द्र सिंह ने इन्द्रा चैक रूद्रपुर के समीप पुराने जिला चिकित्सालय में बड़ी रैली की थी। उस समय इस आन्दोलन को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। लोग नहीं जुटे। उधर मुलायम सरकार भी गिर गयी। राज्य के तुरंत बनने के चांस भी कम हो गये। 1996 में मायावती ने नैनीताल से तराई का हिस्सा अलग करके ऊधम सिंह नगर जनपद बनाया। बसपा भी इस मुददे को भुनाने में लग गयी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि तराई को उत्तराखण्ड से अलग रखने की लड़ाई पंजाब और लखनऊ से संचालित होती थी। तराई में बड़े पैमाने पर पंजाब और लखनऊ के बड़े नेताओं की जमीनें थीं। जानकार बताते हैं कि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल और उनके करीबी रिश्तेदारों की हजारों एकड़ जमीन उस वक्त तराई में थी। इसलिए सीलिंग एक्ट का भय सबको था। हालांकि राज्य बनने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
तराई में बड़े राजनेताओं के अलावा अधिकारियों-अफसरों, बड़े औद्योगिक घरानों, प्रभावशाली सत्ता वर्ग के लोगों के बड़े-बड़े फार्म खाम सुपरिटेंडेंट के जमाने में 1952 में बन चुके थे। यह सिर्फ नैनीताल, ऊधम सिंह नगर में ही नहीं, बल्कि पीलीभीत, रामपुर, बरेली, मुरादाबाद और बिजनौर में भी थे। इनपर जमींदारी कानून, भूमि सुधार कानून और सीलिंग एक्ट का भी खास असर नहीं पड़ा। इसलिए रक्षा समिति के आन्दोलन के माध्यम से जमीन को सुरक्षित और कब्जे में रखने की राजनीति प्रमुख थी। पहाड़ से बने उत्तराखण्ड के चार मुख्यमंत्री पंडित गोविन्द बल्लभ पंत, चन्द्र भानु गुप्त, हेमवती नन्द बहुगुणा और एन डी तिवारी इन्हीं बड़े फार्मरों और भूमि माफिया के समर्थन, धनबल पर सत्ता की राजनीति, इन्हीं के हित में करते रहे। यही वजह है कि ऊधम सिंह नगर रक्षा समिति आन्दोलन हो या दूसरे मैदानी जिलों को उत्तराखण्ड में शामिल कराने की मुहिम, उत्तराखण्ड में सत्ता की राजनीति करने वाले नेता उनके विरोध में कभी मुंह नहीं खोल सके। बल्कि इनमें से अनेक दबे हुये तौर पर उत्तराखण्ड विरोधी तत्वों का पूरा साथ निभाते रहे, अपना राजनीतिक बजूद बनाये रखने की गरज से।
जानकार बताते हैं कि इस आन्दोलन को जनता का व्यापक समर्थन हासिल नहीं था। इसलिए यह स्वतःस्फूर्त न होकर प्रायोजित लगता था। सिख और पूर्वांचली समाज के नेता ही इसके अगुवा थे। मुस्लिम, बंगाली, जनजाति, पर्वतीय समाज के नेताओं ने आन्दोलन से दूरी बनाये रखी। हालांकि कांग्रेस, सपा, बसपा, सीपीएम, किसान यूनियन के नेता खुलकर सड़क पर थे, लेकिन आम जनता को अपने पक्ष में करने में नाकामयाब रहे। भाजपा के तत्कालीन विधायक तिलक राज बेहड़ सहित तराई के तमाम भाजपा नेता अन्दर खाने ऊधम सिंह नगर को उत्तराखण्ड से अलग करने के पक्ष में थे।
जनपद का मुख्यालय रूद्रपुर आन्दोलन का केन्द्र था। यहां व्यापक असर भी था। इसके अलावा किच्छा, सितारगंज, गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर, जसपुर में आन्दोलन का जोर रहता था। पंतनगर, खटीमा, नानकमत्ता, दिनेशपुर, गूलरभोज, शक्तिफार्म में मिली जुली प्रतिक्रिया रहती थी। सरदार प्यारा सिंह, जीत सिंह बिष्टी, स्वामी नाथ चतुर्वेदी, सरदार सुख्का सिंह, ठाकुर जगदीश सिंह, तजिन्दर सिंह विर्क, यशवंत मिश्रा, प्रीतम सिंह संधू, सेवा सिंह, मोहर सिंह, प्रेम सिंह सहोता, कामरेड मंगल सिंह, विवेकानन्द विद्रोही आदि नेता जनपद में रक्षा समिति के लिए सक्रिय थे। हालांकि राज्य बनते ही तमाम नेताओं ने भाजपा-कांग्रेस में ही अपनी गोटी फिट कर ली।
आन्दोलन के तेज होते ही एकाएक सपा का दबदबा बढ़ता गया। प्रारम्भ में किसानों द्वारा शुरू किया गया आन्दोलन जल्द ही समाजवादी पार्टी का आन्दोलन बन गया। राजेश शुक्ला आन्दोलन के संयोजक बन गये थे। हालांकि सर्वदलीय एकता दिखाने के लिए रक्षा समिति का बैनर ही इस्तेमाल किया गया। यह बात 1999 के संसदीय चुनाव से भी सिद्ध होती है। कांग्रेस (ई) से एन डी तिवारी व भाजपा से बलराज पासी चुनाव मैदान में थे। सपा से पैराशूट उम्मीदबार उतारा गया। मशहूर निर्माता निर्देशक मुजफ्फर अली चुनाव लड़े। मुजफ्फर अली को रक्षा समिति का भरपूर समर्थन था। आन्दोलन के चेहरे के तौर पर अली को चुनाव लड़ाया गया। लेकिन घोर निराशा हाथ लगी। जनता ने रक्षा समिति के प्रत्याशी को नकार दिया। तिवारी ने पासी को एक लाख बारह हजार वोटों से पराजित किया। अली की जमानत जब्त हो गयी। उन्हें मात्र 63 हजार वोट मिले। इससे रक्षा समिति के आन्दोलन को जबर्दस्त धक्का लगा। बुरी तरह हार ने साबित किया कि जनता आन्दोलन के साथ नहीं है। समिति में टूटन भी हुई। मुलायम सिंह की फटकार भी नेतृत्वकारियों को झेलनी पड़ी। शीर्ष नेताओं का समर्थन भी कम होने लगा।
1998 का साल रक्षा समिति के आन्दोलन का स्वर्णिम काल था। 20 मई 1998 से जनपद के सभी मुख्यालयों में क्रमिक अनशन व भूख हड़ताल शुरू की गयी। कई बार जनपद बंद का भी आहवान हुआ। आन्दोलन हिंसक भी हुआ। बहुत सी जगह राज्य समर्थक और रक्षा समिति के लोगों के बीच हाथापाई और हिंसा हुई। इस बीच तत्कालीन केन्दीय मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया, पंजाब के सांसद सिमरन जीत सिंह मान, जग देव सिंह तलबंडी ने तराई में कई रैलियां व सभाएं कीं। 1998 के मध्य में ही सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और सीपीएम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने रूद्रपुर के गांधी पार्क में आम सभा करके केन्द्र की राजनीति में भूचाल ला दिया था। 1999 के प्रारम्भ में किसान यूनियन के नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने भी रूद्रपुर आकर रक्षा समिति का भरपूर समर्थन किया। अपना लोक दल के नेता अजीत सिंह ने केन्द्र व राज्य सरकार पर आन्दोलन के समर्थन में जबर्दस्त दवाब डाला।
1999 में 12 फरवरी से 22 फरवरी तक नादेही(जसपुर) से मेलाघाट(खटीमा) तक जनपद में पद यात्रा निकाली गयी। यात्रा का नेतृत्व सपा नेता राजेश शुक्ला ने किया। जानकार बताते हैं कि उस दौरान आन्दोलन को तमाम बड़े किसान नेताओं व व्यवसायियों ने खूब चंदा दिया। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में वाद दाखिल करने के लिए लाखों रूपये एकत्र हुए। नेतृत्वकारियों पर आर्थिक गवन का आरोप भी लगता रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि नेतृत्वकारियों द्वारा आय-व्यय का कोई ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया। इसको लेकर भी कई बार आपस में तना-तनी हुई। बताया जाता है कि पंजाब और लखनऊ के बड़े नेताओं ने भी आन्दोलन जारी रखने के लिए खूब फांइनेंस किया।
राज्य गठन से पूर्व हल्द्वानी-रूद्रपुर, काशीपुर, खटीमा तीन विधानसभा क्षेत्र तराई में थे। काशीपुर में के सी सिंह बाबा, खटीमा में यशपाल आर्या कांग्रेस के विधायक थे। हल्द्वानी-रूद्रपुर से तिलक राज बेहड़ भाजपा के विधायक थे। दो विधायक पर्वतीय होने के कारण भी उनके क्षेत्र में आन्दोलन ज्यादा विस्तार नहीं पा सका। चूंकि भाजपा को राज्य बनाने का श्रेय लेना था, इसलिए भाजपा आन्दोलन के खिलाफ थी। लेकिन तराई में भाजपा नेता रक्षा समिति के साथ थे। 2000 के प्रारम्भ में कांग्रेस नेता एन डी तिवारी ने चैंकाने वाला बयान दिया। जिसका रक्षा समिति ने तो स्वागत किया, लेकिन पहाड़ में तीखा विरोध हुआ। तिवारी ने कहा, ’’ उत्तराखण्ड के साथ मझौला, पीलीभीत, बहेड़ी, बिलासपुर व ठाकुरद्वारा का एरिया शामिल करना चाहिए।’’ उनका तर्क था, ’’ऐसा करने से राज्य की 6 शुगर मिलो को गन्ना मिलता रहेगा।’’
2000 आते-आते आन्दोलन जमीन पर लगभग समाप्त हो चुका था। लेकिन सियासी गलियारे में इसकी गूंज बरकरार थी। प्रकाश सिंह बादल उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री थे। बताया जाता है कि वो आन्दोलन को लीड भी कर रहे थे। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने तमाम नेताओं को अटल सरकार पर दबाव बनाने के लिए राजी किया। ऊधम सिंह नगर की जनता की राय जानने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा कमेटी का गठन किया गया। जिसमें उत्तर प्रदेश के भाजपा के मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज को शामिल किया गया। यह कमेटी सितम्बर 2000 में पंतनगर आयी जरूर, लेकिन रिपोर्ट रक्षा समिति के पक्ष में नहीं दी गयी। जानकार बताते हैं कि कमेटी आन्दोलनकारियों को शान्त करने के लिए एक शिगूफा थी। दरअसल प्रकाश सिंह बादल ने पहले ही अटल सरकार से सांठ-गांठ कर ली थी।
केन्द्र में गठबंधन की भाजपा सरकार थी। अकाली दल के नौ सांसद थे। रक्षा समिति के आन्दोलन की आड़ में बादल ने अपने पुत्र सुखवीर सिंह बादल को क्रेन्दीय मंत्री व दो अन्य सांसदों को केन्द्रीय राज्य मंत्री बनवा लिया। इसके अलावा पंजाब की राजनीति में गहरी दखल रखने वाले नेता सुरजीत सिंह बरनाला को एडजस्ट करना भी प्रकाश सिंह बादल के लिए बड़ी चुनौती थी। उन्होंने अटल से भीतर खाने बात करके सुरजीत सिंह बरनाला को उत्तराखण्ड का पहला राज्यपाल भी नियुक्त कराया। इसके बदले में बादल ने रक्षा समिति के आन्दोलनकारियों को शान्त कराने की जिम्मेदारी ली और पूरी की। 9 नवम्बर 2000 को राज्य गठन के फैसले के साथ रक्षा समिति का आन्दोलन बिना बताये समाप्त हो गया। अगुवा नेता भाजपा-कांग्रेस में जगह तलाशने लगे। इन सबके बीच प्रशासन के द्वारा लादे गये मुकदमों को आन्दोलनकारी 2014 तक भुगतते रहे। हालांकि 2002 में एन डी तिवारी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकांश मुकदमे वापस ले लिये। कुछ रह गये जो धीरे-धीरे 2014 तक अदालत से बरी हुए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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