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जीवन-मौत के बीच वे “आठ दिन और सात रातें

1999 में हुआ था इंडियन एयरलाइंस के विमान IC 814 का अपहरण, इस विमान को काठमांडू से उड़े करीब 25 मिनट हुए थे कि एक अप्रत्याशित घटना हुई। कुछ नकाबपोश लोग हाथों में रिवाल्वर और हथगोले लिए विमान में सभी यात्रियों को डराने धमकाने लगे, विमान लखनऊ के ऊपर के उड़ान क्षेत्र में था तब उन लोगों ने विमानकर्मियों को यह सूचना सभी यात्रियों देने के लिए बाध्य किया कि “इस विमान का अपहरण कर लिया गया है और विमान अब उनके नियंत्रण में है” साथ में धमकी भी दी गयी की उनकी सभी बातों को माना जाये अन्यथा गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।
 
By Ashish Gore

विदेश में रहते हुए कई नए लोगों से परिचय होने का अवसर मिला। इनमें अपने भारतीयों से मिलने में विशेष आनंद मिलता और इनमें से कुछ से मित्रता होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। ऐसे ही एक भारतीय से परिचय हुआ, मित्रता हुयी और वह धीरे-धीरे वह प्रगाढ़ होती हुए पारिवारिक मित्रता में बदल गयी। विभिन्न विषयों पर बातचीत होनें लगी और अपने विचारों का आदान-प्रदान होता और एक दूसरे के जीवन की घटनाओं, अनुभवों का संज्ञान होने लगा।

ऐसे ही एक वार्तालाप में मेरे इस भारतीय मित्र ने अपने जीवन की एक यैसी घटना का उल्लेख किया। जो दिसम्बर 1999 के अंतिम सप्ताह में घटी थी और वे इस दुर्भाग्यपूर्ण और सनसनीखेज घटना के पीड़ित हैं। उस समय इस घटना ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था, भारत की विमानसेवा “इंडियन एयरलाइन्स” के विमान IC 814 का अपहरण, भारतीय नागरिक उड्डयन इतिहास की एक बेहद त्रासद घटना थी। मैं ये सुनकर स्तब्ध रह गया और उस घटना की मार्मिक स्मृतियाँ मन को पुन: विचलित कर गयीं। साथ ही इस घटना के बारे मे और बहुत कुछ जानने की इच्छा भी बलवती हो उठी, मैंने बहुत ही सहमते हुए धीरे से पूछा, क्या मैं इस घटना के बारे में आपसे कुछ पूछ सकता हूँ… मुझे पहले लगा वे ना कहेंगे, क्यों कोई दुःस्वप्न को कुरेदना चाहेगा ये मेरी सोच थी .. पर उन्होंने अविचलित व स्थिरचित्त स्वर में “हाँ” कहा, और मैंने हिम्मत जुटाकर आगे की बातें शुरू की…

भाग -1

शुक्रवार 24 दिसंबर 1999, ठण्ड का मौसम था , मेरे मित्र उस समय, एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी में बड़े अधिकारी थे और नेपाल के दौरे पर थे। शाम को साढ़े चार बजे इंडियन एयरलाइन्स के विमान से काठमांडू से दिल्ली और दिल्ली से अपने गृहनगर पहुंचने के लिए दूसरी उड़ान लेने की उनकी योजना थी. वे जब भी पूर्व में काठमांडू गये थे, वे पशुपतिनाथ मंदिर जरूर जाते, लिहाजा आज की सुबह का समय भी उन्होंने मंदिर में बिताया और बाद में विमान के निर्धारित समय से पूर्व काठमांडू के त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पहुँच गये। पूर्व की यात्राओं का उनका अनुभव ये था की यहां की सुरक्षा व्यवस्था की साख वैसे भी बहुत अच्छी नहीं है, पर आज उन्हें व्यवस्था और ढीली प्रतीत हुई, अपनी बातचीत में लिप्त सुरक्षा कर्मियों ने बेमन से उनकी जाँच की और वे प्रतीक्षालय में जाकर बैठ गए। विमान के विलम्ब की दो बार अलग-अलग घोषणाएं हुई और अन्तत: विमान के उड़ने की घोषणा हुई वे कुछ देर बाद विमान में अपनी एक्सिक्यूटिव श्रेणी की कुर्सी पर जाकर बैठ गए। चूंकि विमान विलम्बित था अत: मेरे मित्र को दो चिंताये सता रही थी, उन्हें दिल्ली हवाईअड्डे पर उनके एक सहकर्मी की पत्नी से ऑफिस की एक महत्वपूर्ण फाइल लेनी थी और उसके बाद उन्हें अपने गृहनगर जाने के लिए अगली उड़ान लेनी थी। विमान उड़ा और वे समाचार पत्र पढ़ने में तल्लीन हो गए। विमान उड़े करीब 25 मिनट हुए थे कि एक अप्रत्याशित घटना हुई। कुछ नकाबपोश लोग हाथों में रिवाल्वर और हथगोले लिए विमान में सभी यात्रियों को डराने धमकाने लगे, विमान लखनऊ के ऊपर के उड़ान क्षेत्र में था तब उन लोगों ने विमानकर्मियों को यह सूचना सभी यात्रियों देने के लिए बाध्य किया कि “इस विमान का अपहरण कर लिया गया है और विमान अब उनके नियंत्रण में है” साथ में धमकी भी दी गयी की उनकी सभी बातों को माना जाये अन्यथा गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

मेरे मित्र समेत सभी यात्रियों को सांप सूंघ गया। विमान अपहरण का डरावना सच सभी के सामने खड़ा था। कुल पांच अपहरणकर्ता विमान में थे, ऐसा कयास यात्रियों ने लगाया, मेरे मित्र समेत एक्सिक्यूटिव श्रेणी के 10 से 12 यात्रियों को किफायती श्रेणी में भेज दिया गया। मेरे मित्र को किफायती श्रेणी के आखरी से पहले वाली पंक्ति में बैठने के लिए मजबूर किया गया। एक्सिक्यूटिव श्रेणी के क्षेत्र पर अपहरणकर्ताओं ने अपना सामान फैलाकर उसे विमान में निगरानी और अपने उपयोग के लिए कब्ज़ा जमा लिया। अपहरणकर्ता बड़े आक्रामक थे, सभी खिड़कियों के परदे नीचे करने के निर्देश दिए गए और सभी को अपने सिर दोनों पैरों पर रखकर झुक जाने को कहा गया। बातचीत या चिल्लाने की सख्त मनाही कर दी गयी और कुछ लोगों की आँखों पर पट्टियां बांध दी गयी।
बात-बात में अपहरणकर्ता विमान को बम से उड़ा देने की धमकी देते रहे और जो लोग थोड़ा बहुत प्रतिरोध करना चाह रहे थे उन पर शारीरिक प्रहार भी करते रहे। कुल मिलाकर खौफनाक स्थिति थी आगे क्या होगा इसकी पूर्ण अनिश्चितता के बीच विमान उड़ रहा था पर उसके गंतव्य और अपहरण के मंतव्य का किसी को ज्ञान नहीं था, और जीवन-मृत्यु जैसी कठिन परीक्षा की घड़ी सामने थी।

उधर दिल्ली हवाईअड्डे पर मेरे मित्र की प्रतीक्षा कर रही उनके सहकर्मी की पत्नी सूचना पटल पर IC814 की स्थिति लगातार विलम्बित होते देख अधीर हो चुकी थी, विमान को काठमांडू से दिल्ली डेढ़ घण्टे में पहुंच जाना था पर लगातार बीतते समय और विमान सम्बन्धी जानकारी का अभाव उनके मन में कुछ गड़बड़ की आशंका खड़ी कर ही रहा था। तभी उन्हें विमान अपहरण की सूचना मिली। आनन- फानन में उन्होंने पास के एस.टी.डी, पीसीओ से फ़ोन लगाकर मेरे मित्र की पत्नी को इस विमान अपहरण की सूचना दी। मेरे मित्र के घर में सन्नाटा छा गया और फिर उनकी बेटियों को घर के बड़ों के साथ छोड़कर उनकी पत्नी और भाई ने अपने गृहनगर से दिल्ली जाने का त्वरित निर्णय लिया।

उधर विमान में ईंधन की कमी, अपहरणकर्ताओं के विमान को काबुल, अफगानिस्तान ले जाने की मंशा पूरी नहीं होने देती। विमान अमृतसर में उतरता है, अपहरणकर्ता विचलित होकर विमान में दो लोगों को घायल कर उनके रक्तरंजित कपड़े नीचे फेंककर ये बताते हैं कि विमान में ईंधन भरा जाय। अन्यथा यात्रियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। अगले दिन के 20वीं सदी के अंतिम क्रिसमस पर्व की बाट जोहता भारत का सरकारी तंत्र, अचानक आपातकालीन सतर्कता जैसा सक्रिय हो जाता है।
अपहरणकर्ता ये भांपकर कि शायद विमान को उड़ने नहीं दिया जायेगा, विमान चालक को विमान 180 अंश घुमाकर लगभग आधी हवाईपट्टी से विमान को उड़ा ले जाने को मजबूर करते हैं। घायल यात्रियों के इलाज के लिए विमान में कोई डॉक्टर है क्या ये पूछा जाता है और इतनी प्रतिकूल परिस्थिति में भी एक हिम्मती महिला डॉक्टर सामने आती हैं और अपना कर्तव्य निभाती हैं। विमान काबुल की ओर उड़ना तो चाहता है पर वहां रात के समय विमान उतरने की व्यवस्था न होने से फिर लौटकर आपातकालीन स्थिति में लाहौर में उतरता है। अपहरणकर्ताओं से बातचीत नहीं हो पाती और विमान को दुबई की ओर रवाना कर दिया जाता है। मेरे मित्र के बगल में बैठी जापानी युवती बेचैन होकर मेरे मित्र से मदद मांगती है, पर मेरे मित्र को डपटकर अपहरणकर्ता मदद करने से रोकते है, उन पर भी प्रहार करते हैं।

विमान दुबई में उतरते ही वहां ईंधन भरा जाता है और कुल 27 यात्रियों जिनमें वृद्ध, महिलायें व बच्चे शामिल होते है उन्हें छोड़ दिया जाता है। अमृतसर में घायल हुए यात्री को डॉक्टर बचा नहीं पाती और उनके पार्थिव शरीर को भी दुबई में विमान से उतार लिया जाता है। कुछ महिलायें व बच्चे अपने पिता या परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों को विमान में छोड़कर विमान से बाहर जाने से मना कर देते है, और अकल्पनीय साहस का परिचय देते हैं, अपहरणकर्ता ये देखकर हैरान रह जाते हैं।

विमान फिर उड़ान और 25 दिसंबर की सुबह कंधार, अफगानिस्तान के वीरान हवाईअड्डे पर उतरता है। मेरे मित्र व अन्य यात्री लगभग 20 घंटो से बिना कुछ खाये-पिये विमान में बैठे होते हैं। किस जगह विमान उतरा है यह भी उन्हें पता नहीं है, तभी पहली बार अपहरणकर्ता विमान के अपहरण का उद्देश्य बताते हैं।
मेरे मित्र, स्थिति की गंभीरता भांपकर अपनेआप को संयम रखने का प्रण करते हैं और किसी भी परिस्थति का सामना करने की मानसिक तैयारी स्वत: के लिए तो कर लेते है पर इस विपरीत हालत में पत्नी, बेटियों, माँ और परिवार के अन्य लोगों पर क्या बीत रही होगी ये सोच उन्हें लगातार विचलित करती है।

उधर भारत में इस सनसनीखेज घटना सम्बन्धी पल-पल की जानकारी टीवी चैनलों के माध्यम से प्रसारित हो रही होती है। मेरे जैसे तमाम भारतीय रात भर जागकर हतप्रभ करने वाली इस घटना को देखते हुए विमान की सकुशल वापसी की कामना करने में जुटे रहते हैं। मेरे मित्र की पत्नी व भाई, अन्य यात्रियों के परिवार के सदस्यों के साथ दिल्ली में जानकारी जुटाने के साथ-साथ भारत सरकार की रणनीति में उनके आत्मजनों की सुरक्षा व सकुशल वापसी की गुहार लगाते हैं।

विमान को कंधार में खड़े अब दो दिन और दो रातें बीत चुकी होती हैं, खिड़कियों के परदे खोलने की अनुमति दी जाती है। खाने में केवल एक सेब या एक संतरा और पीने का पानी उपलब्ध कराया जाता है। कभी-कभी अफगानी नान/परांठा भी दिया जाता है पर खड़े हुए विमान में शौचालयों की दुर्गत अवस्था के कारण कई यात्रियों को भोजन न करना ही उचित लगता है। विमान का वातानुकूलन कमजोर होता जा रहा है, बाहर का तापमान शून्य से 10 डिग्री सेल्सियस नीचे था। यात्रियों के लिए तनावयुक्त प्रतिकूलताएँ बढ़ती ही जा रही थी।

अपहरणकर्ता अपने उद्देश्य को सही साबित करने की चेष्टा लगातार कर अपने काम के लिए सहानभूति बटोरना चाहते थे। भारत के वीर क्रांतिकारी शहीदों के नाम लेकर उन्हें अपने उद्देश्य से जोड़ने का विफल प्रयत्न करने से भी बाज नहीं आते। उनकी मांगें भारत सरकार तक पहुँच गयी होती हैं, फिरौती का भंवरजाल बुन दिया जाता है। रास्ता निकालने की कवायदें शुरू हो चुकी होती हैं, मामला सुलझ रहा है या गतिरोध बना है, इसका अंदाज मेरे मित्र और अन्य यात्री, अपहरणकर्ताओं के सामान्य या आक्रामक रवैये से भली-भाँति ताड़ लेते हैं।

मेरे मित्र एक सुनसान वीरान हवाईअड्डे पर विमान को खड़ा पाते है और सभी दिनों का सिलसिलेवार विवरण एक छोटी सी डायरी में लिखने लगते हैं। उनके पास रीडर्स डाइजेस्ट का एक संस्करण होता है जिसमे संयोगवश इजराइल द्वारा कमांडो कार्यवाही कर, अपहृत विमान के बंधक बनाये गए यात्रियों को छुड़ा लेने की घटना छपी होती है। मेरे मित्र का ढांढ़स बंधता है, पर वे ऐसी कमांडो कार्रवाई में संभावित जन हानि की बात सोचकर विचलित भी होते हैं। उनकी भगवान से प्रार्थना लगातार जारी रहती है, विमान में उपलब्ध इंडियन एयरलाइन्स की “स्वागत” पत्रिका में छपी शबरीमला के भगवान आयप्पा मंदिर सम्बन्धी जानकारी और श्रद्धालुओं की आस्था मेरे मित्र को सम्बल देती है।

दिन बीतने लगते है, गतिरोध बना रहता है, जीवन- मृत्यु की अनिश्चितता जारी रहती है, अपहरणकर्ता, भारत सरकार के अधिकारी और अमान्यता प्राप्त संगठन द्वारा कब्ज़ा किये गए अफगानिस्तान की अनधिकृत सरकार के लोग, बातचीत में लगे है, दावपेंच, कूटनीति, साम-दाम-दंडभेद के पैंतरे आजमाये जा रहे हैं। अपहरणकर्ता अपने साथियों को भारत की जेलों से छुड़वाना चाहते हैं, भारत सरकार गंभीर संकट में है, दुर्दांत अपराधियों को छोड़ना देश की सुरक्षा के लिए हितकारी नहीं है। वहीं उन्हें न छोड़ना बंधक बनाये गए यात्रियों को मृत्यु के द्वार में ढकेलने जैसा है। टीवी पर प्रसारित दृश्य, जिसमें विमान के चारों ओर हथियारबंद डरावने लड़ाके खुलेआम घूम रहे है, विमान पर कमांडो हमला करने के विकल्प को कमजोर कर रहे हैं।

बातचीत के उतार-चढ़ाव विमान के अंदर देखे जा सकते हैं। अब मेरे मित्र जैसे अकेले यात्रा करने वालों को आगे बैठने को कहा गया है, परिवार के लोगों को एक साथ बिठाया गया है। पूरे विमान को बमों से उड़ा दिया जायेगा या यात्रियों को बारी-बारी से मौत के घाट उतारा जायेगा, शायद अब बचना संभव नहीं, ऐसे विचार यात्रियों में पनप रहे हैं। विमान में सन्नाटा छाया है, दहशत फ़ैली है।

जब अपहरणकर्ता बातचीत, अपने पक्ष में मुड़ती देखते हैं तो वे यात्रियों को ढील भी देते है, साथ ही साथ गाना-गाने या चुटकुले सुनाने आदि का अनुरोध भी करते हैं। अपने पढ़े लिखे होने के बाद भी उन्हें ये कदम क्यों उठाना पड़ा इसके पक्ष में तर्क देते है और अपने उद्देश्य का औचित्य समझाने का प्रयत्न करते हैं।

सभी के संयम की परीक्षा जारी रहती है तभी ये समाचार दिया जाता है कि 31 दिसंबर की अंतिम समयसीमा तय की गयी है यानी मांगे मान ली जातीं है तो यात्रियों को छोड़ दिया जायेगा अन्यथा विमान को बम से उड़ा दिया जायेगा। जीवन-मृत्यु का संघर्ष अब अंतिम पड़ाव पर है, नयी सदी में अपनी जीवन यात्रा जा पाएगी या नहीं ये विचार मेरे मित्र के मन में है।

अब 31 दिसंबर 1999 की भोर होती है आज सदी का अंतिम दिन है, विमान में तनावपूर्ण शांति है। विमान को काठमांडू से उड़े आठ दिन और सात रातें बीत चुकीं है, मेरे मित्र काठमांडू हवाईअड्डे के सुरक्षाकर्मियों को याद करने लगते है, जिनकी चूक, लापरवाही और कर्तव्यहीनता विमान के यात्रियों पर गाज गिरा चुकी है। उस दिन विमान के उड़ने में हुयी देरी और लचर सुरक्षा ही अपहरणकर्ताओं को दूसरे विमान से उतरकर IC 814 में हथियारों के साथ चढ़ने का दुर्भाग्यपूर्ण अवसर देती है। आशा- निराशा के द्वन्द के बीच मेरे मित्र एक दूसरे हवाईजहाज के आने की गूंज सुनते है। वीरान हवाईअड्डे पर पिछले आठ दिनों में आने वाला ये पहला विमान है. मेरे मित्र की आंखें कुछ चमकती है तभी अपहरणकर्ता अपनी मॉंग मान लिए जाने की सूचना देते हैं, और बंधकों को छोड़ देने की घोषणा करते है। विमान में खुशी का माहौल बन जाता है। जीवन-मृत्यु का संघर्ष समाप्त हो जाता है। यात्री एक-दूसरे से गले मिलते है और अपने जीवन के कठिनतम क्षणों से मुक्त होने से आल्हादित हो उठते हैं। हवाईअड्डे पर उतरा विमान, भारत सरकार के एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री की अगुआई में, बंधक बनाये गए यात्रियों को अपनी मातृभूमि भारत ले जाने के लिए होता है।

मेरे मित्र यह भी बताते है कि कुछ यात्री,अपहरणकर्ताओं से ऑटोग्राफ और अपने परिवार के लिए सन्देश भी लिखवाते हैं। मैं ये सुनकर आश्चर्यचकित हो जाता हूँ, स्वतः की त्रासदी के खलनायकों से ऐसी हमदर्दी !! तब मुझे पहले पढ़े हुए “स्टॉकहोम सिंड्रोम” की बात याद आ जाती है, स्वीडन के स्टॉकहोल्म में हुई बैंक डकैती की घटना, जिसमें बंधकों का डकैतों के साथ बिताये गए समय में हुआ मनोवैज्ञानिक गठजोड़…

जीवन की इतनी बड़ी घटना का निपटारा होकर मेरे मित्र कंधार से दिल्ली की विशेष उड़ान में बैठे अपहृत विमान के कप्तान और उनके साथ के विमान कर्मियों द्वारा दिखाए गए साहस, संयम, और शारीरिक दक्षता की दाद देना नहीं भूलते। कभी-कभी आयु और वजन के कारण उपहास का कारण बनने वाला सरकारी विमानसेवा का कर्मीदल किस तरह से प्रतिकूल परिस्थितिओं में अपने अनुभव और प्रशिक्षण का पेशेवर शैली में उपयोग करता है। इसका प्रासंगिक उदाहरण मेरे मित्र के मन में उनके प्रति सम्मान को बढ़ा देता है। साथ ही इस गंभीर घटना के पहले दिन अपनी जान गवां चुके अपने उस एकमात्र अपरिचित सहयात्री की शहादत उनकी आँखे नम कर देतीं है, और वे उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली देते हैं।

सदी की अंतिम शाम होते होते विशेष विमान दिल्ली हवाईअड्डे पर उतरता है, सभी यात्रियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया जाता है। परिवार एवं जान-पहचान के लोगों के अतिरिक्त अनजाने हितैषियों की बहुत बड़ी संख्या में उपस्थिति, भारतीय जीवन मूल्यों की छवि वहां दिखाती है। मेरे मित्र हवाईअड्डे पर अपनी पत्नी व अपने भाई से मिलकर भावुक हो जाते हैं, और आठ दिन और सात दिनों की त्रासदी झेलने के बाद जीवन को नए सिरे से शुरुआत करने के लिए प्रतिबद्ध हो जाते हैं।

अगले दिन 1 जनवरी, 2000, 21वीं सदी की पहली सुबह दिल्ली से मेरे मित्र अपने परिवार के साथ अपने गृहनगर की उड़ान लेते हैं, विमान गृहनगर के हवाईअड्डे पर उतरता है, वे अपहृत विमान के अकेले यात्री है, जब वे बाहर आते है तो उनका हीरो की तरह स्वागत होता है। सैकड़ों अनजान लोग, टीवी चैनल, पत्रकार सभी उन्हें देखने, उनसे बात करने लालायित रहते है। मेरे मित्र को तब इस बात का एहसास होता है की इस घटना के पल-पल की जानकारी कितनी बेचैनी और गौर के साथ प्राप्त की गयी है। पुलिस के संरक्षण में वे अपने घर पहुंचते है और टकटकी लगाए बैठी माँ, बेटियों और अन्य सदस्यों से मिलकर गदगद हो जाते हैं।

अगले कुछ दिन मेरे मित्र सेलेब्रिटी के रूप में रहते हैं, अनेक समाचार पत्रों में साक्षात्कार, टीवी कार्यक्रम, रेडियो वार्तायें , विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा दी गयी सौजन्य भेंट उन्हें त्रासदी की थकान और विपरीत प्रभाओं से बचाने का काम करतीं हैं। मजबूत शारीरिक अवस्था और मानसिक संतुलन के चलते मेरे मित्र जल्दी ही अपने काम में जुट जाते हैं और केवल दो सप्ताह के बाद ही एक बार फिर से कंपनी के काम से हांगकांग जाने का साहसिक जज्बा भी रखते हैं।

भाग- 2

मेरी मित्र से बातचीत जारी रहती है, इस हैरतअंगेज घटना के भुक्तभोगी और प्रत्यक्षदर्शी से बात करते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है। मेरा गला रुंधने लगता है और लिखते समय हाथ में कम्पन बढ़ जाता है पर मेरे मित्र पूरी तरह से स्थिर और प्रसन्नचित्त हैं. वे आगे बताते हैं….

इस घटना के बाद अगले लगभग 1 -2 वर्षों तक उन्हें अपरिचित व्यक्तियों के उनके गृहनगर या अन्य शहरों से फ़ोन आते रहे, फोन पर अपरिचित व्यक्ति और उनके परिवारजन मेरे मित्र को यह बताते हैं कि जब विमान अपहरण की घटना चल रही थी तब उन्होंने कैसे विमान यात्रियों की सकुशल वापसी की प्रार्थना मंदिरों में की थी या मन्नत मांगी थी। अब चूंकि आप जैसे यात्री सकुशल वापस आ गए है तो आप हमारे घर या मंदिर में आकर आशीर्वाद लें और मन्नत की पूर्णता करें। मेरे मित्र ऐसे बहुत सारे अनुरोधों को स्वीकारते हैं और अपरिचित व्यक्तियों ने किये प्रयासों के समक्ष नत-मस्तक हो जाते है। मुझे लगा कि भारतीयों के इन्हीं संवेदनशील मानवीय मूल्यों के कारण ही देश के शत्रुओं के क्रूर प्रयन्त विफल हो जाते है, मुझे मन ही मन धन्यता की अनुभूति होती है। मेरे मित्र के मन पर इन अपरिचित व्यक्तियों का, किसी और पर आयी विपत्ति में प्रार्थना करने का जज्बा गहरा असर हो चूका है, और जब भी कोई प्राकृतिक आपदा या अन्य विपत्ती किसी पर आती है तो मेरे मित्र बेहद विचलित हो जाते हैं और फिर प्रार्थना में जुट जाते हैं। पिछले दिनो थाईलैंड की गुफा में नवयुवकों के फंसे होने के समाचार ने मेरे मित्र को बेचैन रखा और उन्होंने भी इन नवयुवकों की सकुशल वापसी के लिए मन्नत मांगी थी, जिसकी पूर्णता वे प्रसन्नता से करेंगे।

विमान अपहरण की घटना के बाद उनके कुछ सहयात्री व सहयात्रियों के परिवारों के लोग मेरे मित्र से सम्पर्क साधते हैं, वे भारत सरकार या इंडियन एयरलाइन्स से त्रासदी का मुआवजा मांगना चाहते हैं। मेरे मित्र प्रखर मूल्यों के धनी हैं वे उत्तर देते है भारत सरकार के निर्णय और प्रयासों से ही वे मृत्यु के द्वार से वापस आये हैं, मुआवजा मांगने का उन्हें अधिकार ही नहीं है। उनकी सोच उनके प्रति मेरे सम्मान को द्विगुणित कर देती है, भावुक होकर वे तत्कालीन प्रधानमंत्रीअटल बिहारी वाजपेयी जी को अपने नवजीवन का श्रेय देते हैं। साथ ही साथ वे भारत की न्याय व्यवस्था से अतिसंवेदनशील और देश की सुरक्षा से सम्बंधित अपराधियों के मामलों को जल्दी से सजा देकर निपटाने की अपेक्षा भी रखते हैं, जिससे इस तरह की घटनायें दोहराई न जा सके।

विमान अपहरण की घटना के समय उनकी अमरीकी कंपनी ने उनके परिवार की पूरी मदद की और संकट के घड़ी में ढांढ़स बंधाया जिससे मेरे मित्र अपनी कंपनी से बेहद संतुष्ट और प्रसन्न रहते हैं। साथ ही साथ व्यक्तिगत तौर पर वे जीवन बीमा, यात्रा बीमा, स्वास्थ बीमा जैसी बातों पर और सतर्कता बरतते हैं।

घटना के कुछ वर्षों बाद एक भावनात्मक अनुबंध का संयोग आता है, मेरे मित्र विमान में अपनी यात्रा के लिए बैठते है, सामान्य घोषणाओं के रूप में विमानचालक का नाम बताया जाता है, मेरे मित्र के कान खड़े हो जाते हैं। आज की उड़ान के मुख्य चालक वही व्यक्ति हैं जो IC 814 के हीरो थे, फिर वे दोनों पूरी गर्मजोशी से एक-दूसरे से मिलते है और उस दुःस्वप्न से उबरकर गढ़े अपने नवसृजित जीवन की दास्ताँ साझा करते हैं।

इस घटना के बाद से वे स्वयं को और संयमी और परिपक्व पाते हैं, पूर्व में होने वाला उतावलापन या चिड़चिड़ाहट अब गायब हो चुका है और उनके नवजीवन में वे जीवन की नयी ऊंचाईयों पर पहुंचने के लिए पहले से भी अधिक कर्मठता से डटे हुए हैं।

मेरे इस साहसी, बुलंद हौसले , और ऊँचे मनोबल वाले मित्र प्रशांत खरवडकर को “सलाम”. प्रशान्त आपके साहस और जीवन में सकारात्मक सोच रखकर और प्रतिकूल परिस्थितियों के समक्ष न झुककर, आगे बढ़ने की गाथा दिल को छू गयी। आप जैसा मित्र पाकर धन्यता और गर्व की अनुभूति हुई !!
The writer is vice president in a multinational company and based at Shanghai

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