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दिल्ली की सामूहिक आत्महत्या ने उठाए कई सवाल!

11 लोगों का सुसाइड ये जाहिर करता है कि हम मॉडर्न होने के बाद भी ऑर्थोडॉक्स हैं। ये चरित्र पूरे समाज का है क्योंकि हम उस देश में रहते हैं जहां जब एयरक्राप्ट तेजस को एयरफोर्स में इडक्ट किया गया तो उस पर तिलक लगाया गया।

 संजय बिष्ट

नई दिल्ली। दिल्ली का मास सुसाइड ”नासा सोच” के चीथड़े उड़ाती है। 11 लोगों का सुसाइड ये जाहिर करता है कि हम मॉडर्न होने के बाद भी ऑर्थोडॉक्स हैं। ये चरित्र पूरे समाज का है क्योंकि हम उस देश में रहते हैं जहां जब एयरक्राप्ट तेजस को एयरफोर्स में इडक्ट किया गया तो उस पर तिलक लगाया गया। मैं दिल्ली के निजामुद्दीन ब्रिज पर कई बार देखता हूं कि लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों से उतरते हैं और कुछ बुदबुदाते हुए काटा नीबू और कुछ दाल यमुना में फेंक देते हैं। ये इसलिए होता है कि हमने समाज में तर्क की जगह धार्मिक कर्म कांड को प्राथमिकता दी है। आज भी धर्म के आगे सोच, नीति और तर्क शास्त्र पानी भरता है। और इसकी आदत हमें बचपन से ही लगा दी जाती छुटपन में साइंस की बुक के पहले पन्ने पर ओम या जय श्री राम या शिव लिखने वाले हम ही हैं। IIT की तैयारी करने वालों को भी मैंने किताबों की पूजा कराते देखा है। दरअसल धर्म खुद में एक वैज्ञानिक चेतना है जो हमारी मानसिक स्थिति को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती है लेकिन धर्म के ठेकेदार बीच में आ गए और ऐसा ज्ञान समाज में पेश किया गया जहां तर्क और विवेक की कोई जगह​ नहीं थी अगर आप अपने विवेक से काम करने लगे तो फिर मंदिरों के पंडों की दुकान कैसे चलेगी। टीवी में चलने वाली बहसों में क्या आपको तर्क का जवाब तर्क से मिलता है?????

अगर नहीं तो आपको उन नेताओं की सोच को आंकना होगा, दिल्ली में जिन लोगों ने सुसाइड किया उसमें कोई मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था तो कोई अच्छे संस्थान से पढ़ाई कर रहा था। कहा जा रहा है किं तंत्र-मंत्र और मोक्ष पाने के लिए सभी ने मौत को गले लगा लिया। Gen X सोच भी उन लोगों को नहीं बचा

सकी । आखिर बचा पाती भी तो कैसे क्योंकि पढ़ाई का मकसद ही सिर्फ अमेरिका जाकर ऊंची नौकरी हासिल कर लेना भर है। अमेरिका चले गए तो समझिए ज़िन्दगी धन्य। लेकिन अमेरिका चले जाना ही समाज के तरक्की करने का पैमाना नहीं है, अगर ऐसा होता तो कठुआ केस में कई अमरीका में बसे NRI आरोपियों के पक्ष में ट्वीट नहीं कर रहे होते। विश्वास आगे बढ़ कर अंध विश्वास में बदल जाता हैं लेकिन तार्किक सोच विश्वास को आत्म विश्वास में बदलती है। दुख इस बात का है कि हम धर्म के समांतर चिंतनशील समाज विकसित नहीं कर पाये। इसीलिए दिल्ली के उस परिवार को मोक्ष का रास्ता मौत में नजर आया।

 

लेखक इंडिया टीवी में कार्यरत हैं।

 

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