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भारत की नई उड़नपरी ‘हिमा’

एक साधारण किसान के घर में लड़की का जन्म, छोटे से गांव में रहना, पूर्वोत्तर के अशांत प्रदेश की छवि, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, अंग्रेज़ी भाषा ठीक से न बोल पाने से नाहक ही उपजी हीन भावना, आर्थिक व सामाजिक असमानता, बडे शहरों की दंभी मानसिकता, भारतीयों के शारीरिक दमख़म पर लगे प्रश्न चिन्ह। इन सभी बाधाओं से संघर्ष करते हुए 21 वीं सदी के भारत की ये बेटी पहले बचीफिर पढ़ीं व उसके बाद प्रतिभा के बलबूते ऐसे दौड़ी कि दुनिया से अपना लोहा मनवाकर ही रुकीं।

By Ashish Gore, Shanghai

फ़िनलैंड के शहर टेम्पेरे में खेली गई 20 साल के कम उम्र की विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भारत की धाविका हिमा दास ने इतिहास रच दिया। महज 18 वर्षीय युवा एथलीट ने 400 मीटर दौड़ के फाइनल में स्वर्ण पदक जीतकर करोड़ों भारतवासियों को खुशी से झूमने पर विवश कर दिया। इस तरह भारत को इतने बड़े स्तर के एथलेटिक्स  मुकाबले में पहली बार पदक और वह भी स्वर्ण पदक दिलाकर हिमा रातों रात बुलंदियों पर पहुंच गयी हैं। यह कहने में कोई दो राय नहीं कि भारत में अब एक और उड़न परी पैदा हो गयी है। पीटी ऊषा के बाद हमें एक और ऐसी धाविका मिल गयी है, जिससे ओलंपिक और विश्वस्तरीय मुकाबलों में मेडल की आस लगायी जा सकती है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि दो साल पहले तक हिमा लड़कों के साथ फुटबाल खेला करती थी। लेकिन  रेस के मैदान में कदम रखने के बाद फिर कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा।

अगर फिनलैंड में हुए फाइनल की बात करें तो दौड़ की शुरूआत में थोड़ा पिछड़ने के बाद अंतिम क्षणों में जिस तेज़ी व शक्ति से हिमा ने दौड़ लगायी वह अविस्मरणीय व अभूतपूर्व कही जाएगी। दौड़ में हमेशा अग्रणी रहने वाले देश अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जमैका, केन्या, कनाडा आदि की धाविकाओं को कड़ी टक्कर देकर उनसे आगे निकलना हिमा की प्रतिभा व मेहनत की सुखद पहचान करा गया।

हिमा दास, आपके स्वर्ण पदक ने बहुत सी सार्थक-निरर्थक चर्चाओं, सही-ग़लत के तर्कों में सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाने की प्रेरणा दी है… अंतहीन विचार विमर्शों की लम्बी सूची अब शायद छोटी होने लगे। एक साधारण किसान के घर में लड़की का जन्म, छोटे से गांव में रहना, पूर्वोत्तर के अशांत प्रदेश की छवि, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, अंग्रेज़ी भाषा ठीक से न बोल पाने से नाहक ही उपजी हीन भावना, आर्थिक व सामाजिक असमानता, बडे शहरों की दंभी मानसिकता, भारतीयों के शारीरिक दमख़म पर लगे प्रश्न चिन्ह। इन सभी बाधाओं से संघर्ष करते हुए 21 वीं सदी के भारत की ये बेटी पहले बची, फिर पढ़ीं व उसके बाद प्रतिभा के बलबूते ऐसे दौड़ी कि दुनिया से अपना लोहा मनवाकर ही रुकीं।

हम सभी आपकी भावुक अश्रुधारा में भारतीय मूल्यों से जुड़ी संवेदनाओं के साथ-साथ खेल जगत में नये भारत की सुनहरी संभावनाओं की झलक देख सकते हैं। छोटे गांव की इस लड़की के प्रदर्शन से हम हमारे देश में खेल संघों के कर्ता-धर्ता शायद गहरी नींद से जाग जायें। क्योंकि भारत में अकसर प्रतिभाएं दुनिया के सामने आने से पहले ही खत्म हो जाया करती हैं। तमाम मुश्किलों के बावजूद यह मुकाम हासिल करने के लिए हिमा दास को ढेरों बधाईयां…..

 

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