संस्कृति

लोगों के जीवन में कैसी मिठास घोल रहे हैं गुलगुले, पढ़िए पूरी स्टोरी!

गुलगुलों का स्वाद आपने भी कभी न कभी तो  चखा ही होगा, वैसे तो गुलगुले तमाम हलवाई बनाते हैं, लेकिन कुछ की बात ही अलग होती है। ऐसे ही एक शख्स हैं कृपाल सिंह, जो लगभग 4 दशक से लोगों की जिंदगी में मिठास घोल रहे हैं। इतने लंबे वक्त में न तो गुलगुले बनाने के तरीके में कोई फर्क आया है और न ही स्वाद में। उनके बनाए गुलगुलों का किस्सा अपने ही अंदाज में बयां कर रहे हैं संजय बिष्ट।

एक धड़धड़ाती सड़क,गाड़ियों का काफिला, धुएं का गुबार, एक बेनूर दुकान, दुकान के अहाते में परंपरागत चूल्हे की धधकन, आंच पर चढ़ी एक कढ़ाही और पाग की ढेंकची से निकलते गुलगुलों की मिठास। जरा मुंह में रखकर देखिए इन गुलगुलों को। जुबां पर ऐसे बिला जाएंगी जैसे घी हो। स्वाद ऐसा की आब-ए-जमजम सी ठहरी पुरसुकून तासीर। नथुनों पर लगाकर महक लीजिए इन मीठे गुलों की, अलीफ लैला की कनीज के इत्र का अहसास होगा। गांव से कस्बा बनने को छटपटाते एक अलसाए इलाके में खिचड़ी दाढ़ी वाले एक शख्स के लिए इन्हें बनाना दुकान चलाने जैसा नहीं बल्कि दुआ मांगने जैसा है। वो अपनी रोजी रोटी में ऐसे बैठता है जैसे सजदा कर रहा हो, गुलगुले ऐसे बनाता है जैसे पाक हर्फ पढ़ रहा हो। दशकों से ठिठकी विरासत को पूरी शान से आगे बढ़ा रहा है ये शख्स। इनके हाथ के बने गुलगुले इनके परिवार के झंडाबरदार हैं। रेंगती सड़कों से ये गुलगुले मीलों मील तक जा रहे हैं और एक विरासत का सितारा दूर तक बुलंद हो रहा है।

अधेड़ उम्र..खिचड़ी दाढ़ी वाले इस शख्स की इलाके को आदत सी पड़ गई है…कृपाल सिंह नयाल यानी कृपाल दा…ये वही शख्स हैं जो पिछले चालीस साल से लोगों की जिंदगी में मिठास घोल रहे हैं…इनके हाथ से छना एक एक गुलगुला टेस्ट की गारंटी बन जाता है… इलाके की पहचान इस शख्स से और उनकी इस परंपरागत दुकान से है….उत्तराखंड के अल्मोड़ा से करीब चालीस किलोमीटर दूर कौसानी रोड पर सोमेश्वर के तल्ली बाजार में है कृपाल दा की दुकान…सोमेश्वर में उनकी दुकान एक ऐसा लैंड मार्क है कि पूरा बाजार दो हिस्सों में बंट गया है…एक कृपाल दा के दुकान की बाएं तरफ की मार्केट और दूसरी कृपाल दा की दुकान के दाएं तरफ वाली मार्केट….

कृपाल दा अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी हैं जो गुलगुले बना रहे हैं…ये दुकान करीब सौ साल पुरानी है…कृपाल दा के दादा ने एक जमाने में इस लजीज व्यंजन को बनाने की शुरूआत की थी..जिसे उनके पिता और उन्होंने आगे बढ़ाया…

वक्त बदला है लेकिन गुलगुलों के न ही स्वाद में कोई कमी आई है..न ही बनाने के तरीके में…कृपाल दा गुलगुले बनाने में चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं… चीड़ की लकड़ी से चूल्हा धधकता है…..दरअसल आसपास यही लकड़ी उपलब्ध भी है…उनका चूल्हा ठेठ पहाड़ी स्टाइल का है…चूल्हे की बनावट में भी ज्यादा बदलाव नहीं किया गया है… गुलगुले बनाने के लिए आटे  का इस्तेमाल होता है… इन्हें बनाने में जो घी इस्तेमाल होता है वो खास होता है…घी की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है… पहाड़ी वनस्पति खाने वाली भैसों के दूध से ये घी तैयार किया जाता है..उसमें मिलावट का कोई चांस नहीं है… चीड़ की लकड़ियों की धीमी आंच में एक एक गुलगुले को पकाया जाता है..भूरा रंग आने पर उसे चाशनी में डुबा दिया जाता है..चाशनी  से तरबतर पूरा गुलगुला आप के मुंह में नहीं समा सकता..इसलिए आपको किस्तों में इनका  स्वाद लेना होगा….

गुलगुले बनाने की सारी कवायद के कमांडर सिर्फ और सिर्फ कृपाल दा ही हैं….गुलगुले बनाने से लेकर बेचने तक की जिम्मेदारी उनकी ही है…कृपाल दा की दुकान पर मुद्रास्फिति हमेशा औंधे मुंह गिरी रहती है…  सिर्फ पांच रूपये में आप रसीले गुलगुलों का मजा ले सकते हैं…पूरे इलाके में कृपाल दा के गुलगुले अलग अलग रूपों में मौजूद हैं…इलाके का हैप्पीनेस इंडेक्स, घर में गुलगुलों की मौजूदगी या गैरमौजूदगी से मापा जा सकता है… मेरे सामने ही एक पिता ने दो दर्जन गुलगुले पैक करवाए, उनकी लड़की को लड़के वाले देखने आ रहे थे, शुभ काम आगे बढ़े, इसलिए कृपाल दा के गुलगुले होना तो लाजमी है….गांव के स्कूली बच्चों की डेली लिस्ट में मालपुए शामिल हैं… खेतों के काम निपटाती पहाड़ी महिलाओं की विश लिस्ट इनके बिना अधूरी है… बच्चे जब रूठते हैं तो बुजुर्ग आमा, अपने नाती को कृपालदा के गुलगुले खिलाने का आश्वासन देती है..घर लौटने वाले सिपाही के फौजी बैग में परिवार के लिए गुलगुले होते हैं…बैंक से लौटते ग्रामीण कम ही सही लेकिन गुलगुलों को अपने झोले के हवाले कर ही देते हैं.. कौसानी जाने वाले टूरिस्ट सुनी सुनाई बातों पर भरोसा करते हैं और अपनी गाड़ी इस दुकान के सामने खड़ी करते हैं…

करीब साठ साल के हैं कृपाल सिंह नयाल… कभी कभार उनके बेटे उनका हाथ बंटाते हैं… क्या कृपाल दा की विरासत उनकी अगली पीढ़ी संभालने को तैयार है? इस सवाल के जवाब में उनके चेहरे पर मुसकान पैठ जाती है, वो बोलते हैं, ‘दाज्यू, गुलगुले  बनाने से क्या होगा? कमाई कहां है? नौकरी ज्यादा सही उपाय है…’  वैसे कहावतों में गुलगुले खाने का मतलब लग्जरी लाइफ स्टाइल जीना है लेकिन यहां ऐसा नहीं है… कृपाल दा के गुलगुले ग्रामीण और निम्न मध्यम वर्ग को तृप्त करते हैं…. खर्च करने की उनकी सीमा के शीर्ष पर जाकर जुबान को सुख देते हैं… वैसे कभी कौसानी घूमने जाएं तो सोमेश्वर में कृपाल दा की दुकान पर जरूर रूकें और चाशनी में डूबे गुलगुलों का मजा लें..

लेखक इंडिया टीवी में कार्यरत हैं

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